मरीजों ने लगाया ‘जबरन वसूली’ का आरोप, अस्पताल प्रबंधन बोला— सुरक्षा के लिए बनाया नियम
जिला संवाददाता विकास मिश्रा
अटरिया/सीतापुर। जनपद के अटरिया क्षेत्र स्थित मऊ का चर्चित हिंद हॉस्पिटल एक बार फिर विवादों के घेरे में आ गया है। कुछ दिन पहले कथित गलत ऑपरेशन को लेकर सुर्खियों में आए इस निजी अस्पताल पर अब मरीजों और उनके तीमारदारों से अतिरिक्त शुल्क वसूलने के आरोप लग रहे हैं। अस्पताल में लागू की गई नई दवा व्यवस्था ने लोगों में भारी नाराजगी पैदा कर दी है।
बाहर से दवा लाई तो देना होगा ‘एंट्री चार्ज’!
अस्पताल परिसर में चस्पा एक नोटिस इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। नोटिस के अनुसार यदि कोई मरीज अस्पताल की फार्मेसी से दवा न लेकर बाहर से दवा खरीदकर लाता है, तो उसे अतिरिक्त शुल्क देना होगा। सामान्य मरीजों के लिए ₹50 और कार्डियोलॉजी व न्यूरो विभाग के मरीजों के लिए ₹100 जमा करना अनिवार्य बताया गया है। शुल्क जमा होने के बाद ही अस्पताल में बाहर से लाई गई दवाओं का उपयोग किया जाएगा।
इस नियम को लेकर मरीजों और उनके परिजनों में गहरा असंतोष दिखाई दे रहा है। लोगों का कहना है कि इलाज और महंगी दवाओं से पहले ही परेशान मरीजों पर अब नया आर्थिक बोझ डाला जा रहा है।
“पैसा दो, तभी सही मानी जाएगी दवा”
स्थानीय लोगों और तीमारदारों का आरोप है कि यदि निर्धारित शुल्क जमा नहीं किया जाता, तो डॉक्टर बाहर से लाई गई दवा लगाने या इस्तेमाल करने से मना कर देते हैं। वहीं शुल्क जमा होते ही वही दवा अचानक “उपयोग योग्य” घोषित कर दी जाती है।
लोग सवाल उठा रहे हैं कि अगर बाहर से लाई गई दवा संदिग्ध या गलत है, तो पैसा जमा करने के बाद वह सही कैसे हो जाती है? यही सवाल अब पूरे इलाके में चर्चा और बहस का विषय बन चुका है।
अस्पताल प्रबंधन ने दी सफाई
मामले पर अस्पताल की चेयरपर्सन रिचा मिश्रा ने सफाई देते हुए कहा कि यह व्यवस्था मरीजों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर लागू की गई है। उनका कहना है कि कई बार डॉक्टरों की लिखावट मेडिकल स्टोर संचालक सही ढंग से नहीं समझ पाते, जिससे गलत दवा मरीज तक पहुंचने का खतरा रहता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लिया जाने वाला शुल्क डॉक्टरों की फीस से जुड़ा हुआ है और अस्पताल में डॉक्टरों की फीस ₹50 और ₹100 निर्धारित है। हालांकि विस्तृत जानकारी देने के लिए उन्होंने अस्पताल आने की बात कही।
सवालों के घेरे में निजी अस्पतालों की व्यवस्था
भले ही अस्पताल प्रबंधन इसे सुरक्षा व्यवस्था बता रहा हो, लेकिन आम जनता इसे मरीजों की मजबूरी का फायदा उठाकर की जा रही वसूली मान रही है। लोगों का कहना है कि यदि सुरक्षा ही उद्देश्य है, तो बाहर से लाई गई दवाओं की जांच की व्यवस्था होनी चाहिए, न कि शुल्क लेकर उन्हें “मान्य” बनाया जाए।
इस पूरे मामले ने निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और मरीजों के अधिकारों पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस विवाद का संज्ञान लेकर कोई कार्रवाई करता है या नहीं।
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