(मुकेश कुमार जैन संवाददाता )
आज की यह पावन चतुर्दशी तिथि, सच में साधना और तप की एक अद्भुत मिसाल बन गई…
परम पूज्य गुरुदेव प्रणम्यसागर महाराज के आज्ञाकारी शिष्य,
ऐलक अनुरूप सागर महाराज ने
खड्गासन मुद्रा में स्थित रहकर
लगातार १२ घंटे की सामायिक करते हुए
कायक्लेश महातप की कठोर साधना संपन्न की…
यह कोई साधारण तप नहीं,
यह आत्मा को निर्मल करने का,
कर्मों को क्षीण करने का,
और आत्मबल को जागृत करने का एक दिव्य प्रयास है…
जब शरीर थकता है,
मन डगमगाता है,
तब भी जो साधक अडिग रहता है—
वही सच्चे तपस्वी कहलाते हैं…
ऐलक अनुरूप सागर महाराज की यह तपस्या
हम सभी के लिए प्रेरणा है,
संयम, साधना और आत्मशुद्धि का एक जीवंत उदाहरण है…
धन्य है ऐसी तपस्या…
धन्य है ऐसे तपस्वी…
हम सभी हृदय से उनके इस महान तप की
अनुमोदना करते हैं…
और प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि
ऐसा ही तपबल और वैराग्य हम सभी को भी प्राप्त हो…
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