प्रतापगढ़ || सैलखा की यादव बस्ती… एक ऐसा नाम, जो पिछले 100 वर्षों से एक पुराने विवाद की वजह से चर्चाओं में रहा। यह सिर्फ जमीन या आपसी मनमुटाव का मामला नहीं था, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही ऐसी कड़वाहट थी जिसने रिश्तों को तोड़ दिया, भाई को भाई से अलग कर दिया और पूरे गांव के विकास को जकड़ कर रख दिया।
बाप-दादा के समय से शुरू हुआ यह झगड़ा बेटों और पोतों तक पहुंच गया। कितनी पंचायतें हुईं, कितने कागज़ भरे गए, कितने समझौते लिखे गए — लेकिन हर बार समाधान अधूरा ही रह गया। गांव में हर खुशी के मौके पर यह विवाद दीवार बनकर खड़ा हो जाता था। चुनाव हो या त्योहार, हर समय तनाव का साया मंडराता रहता था।
गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि “ऐसा लगता था जैसे यह झगड़ा कभी खत्म ही नहीं होगा।” कई बार प्रशासनिक स्तर पर भी कोशिशें हुईं, लेकिन नतीजा वही — शून्य।
लेकिन हालात ने अचानक करवट ली।
रामगंज नगर पंचायत के अध्यक्ष राकेश कुमार सिंह सैलखा पहुंचे। उन्होंने किसी एक पक्ष की नहीं, पूरे गांव की बात की। उन्होंने दोनों पक्षों को एक मंच पर बैठाया। बिना आरोप-प्रत्यारोप के, बिना ऊँच-नीच के, शांत माहौल में बातचीत शुरू हुई।
बताया जाता है कि घंटों चली बैठक में उन्होंने हर पक्ष की बात धैर्य से सुनी। पुरानी शिकायतों को समझा, भावनाओं को महत्व दिया और ऐसा रास्ता सुझाया जो सबको स्वीकार हो। वह बैठक सिर्फ चर्चा नहीं थी — वह एक ऐतिहासिक मोड़ था।
और फिर वह पल आया जिसका इंतजार पीढ़ियों से था।
दोनों पक्षों ने हाथ मिलाया। आपसी सहमति से समझौता हुआ। गांव में तालियां गूंजीं, लोगों ने एक-दूसरे को गले लगाया। जहां कल तक तल्खी थी, वहां आज अपनापन नजर आया।
इस समझौते के साथ ही सैलखा में विकास की नई राह खुल गई है। जो योजनाएं विवाद के कारण अटकी हुई थीं, अब उनके आगे बढ़ने की उम्मीद जगी है। ग्रामीणों का कहना है कि “अब गांव एकजुट होकर आगे बढ़ेगा।”
स्थानीय लोगों ने इसे “ऐतिहासिक दिन” बताया है। उनका कहना है कि यह सिर्फ विवाद का अंत नहीं, बल्कि नई सोच की शुरुआत है।
सैलखा की धरती पर जो हुआ, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बन गया है — कि अगर नीयत साफ हो और नेतृत्व मजबूत, तो सौ साल का अंधेरा भी खत्म हो सकता है।
अब गांव में एक ही चर्चा है — “सैलखा में नया सवेरा हो चुका है।”
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