*जैन धर्म में केश लोच (बालों का*त्याग) का महत्व*
(मुकेश कुमार जैन )संवाददाता.आज सिंगोली नगर के विद्यासागर संत शाला मे मुनि प्रणम्य सागर जी के संघस्थ एलक अनुपम सागर जी का केशलोच सम्पन्न हुआ.जैन संत देव शास्त्र गुरु को ही अपना सब कुछ मानते है और किसी के आगे नहीं झुकते है.केशलोच सयंम के लिए किया जाता है.लौकिक संसार मे केश (रूपये ) के बिना कुछ नहीं मिलता ठीक ऐसे ही जैन धर्म मे बिना केश लोच के कुछ नहीं.यही से सयंमी की धर्म यात्रा शुरू होती है.
"जहाँ त्याग है, वहाँ तप है…
और जहाँ तप है, वहीं आत्मा का उत्थान है…"
जैन धर्म में केश लोच केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि अहंकार, मोह और देहाभिमान का त्याग है।
यह वह क्षण होता है जब साधु-साध्वी अपने शरीर की सुंदरता और आसक्ति को त्यागकर आत्मा की शुद्धि की ओर अग्रसर होते हैं।
केश लोच का अर्थ है – अपने बालों को स्वयं हाथों से उखाड़ना।
यह सुनने में कठिन लगता है, लेकिन जैन साधु इसे सहज भाव से, बिना किसी पीड़ा के प्रदर्शन के करते हैं।
यह उनके अद्भुत संयम और सहनशीलता का प्रतीक है।
यह प्रक्रिया हमें सिखाती है कि –
शरीर नश्वर है,सौंदर्य क्षणिक है,और आत्मा ही शाश्वत है
जब एक मुनि केश लोच करते हैं, तब वे यह संदेश देते हैं कि
"मैं इस शरीर से नहीं, बल्कि आत्मा से जुड़ा हूँ।"
केश लोच हमें यह भी प्रेरणा देता है कि हम अपने जीवन में
अहंकार, क्रोध, लोभ और माया जैसे आंतरिक "केशों" को भी उखाड़ फेंकें।
यह तपस्या हमें सिखाती है कि
सच्चा सुख बाहरी रूप में नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और आत्मज्ञान में है।
"आओ, हम भी अपने जीवन में त्याग और संयम को अपनाएँ,
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